Shabda Vanshi Hindi Blog

आज की कहानी ।। आसक्ति का बोझ

*🕸आज की कहानी 🕸*

*⛰️आसक्ति का बोझ ⛰️

*एक महात्मा तीर्थयात्रा के सिलसिले में पहाड़ पर चढ़ रहे थे। पहाड़ ऊंचा था। दोपहर का समय था और सूर्य भी अपने चरम पर था। तेज धूप, गर्म हवाओं और शरीर से टपकते पसीने की वजह से महात्मा काफी परेशान होने के साथ दिक्कतों से बेहाल हो गए। महात्माजी सिर पर पोटली रखे हुए, हाथ में कमंडल थामे हुए दूसरे हाथ से लाठी पकड़कर जैसे-तैसे पहाड़ चढ़ने की कोशिश कर रहे थे। बीच-बीच में थकान की वजह से वह सुस्ता भी लेते थे।*



*पहाड़ चढ़ते - चढ़ते जब महात्माजी को थकान महसूस हुई तो वह एक पत्थर के सहारे टिककर बैठ गए। थककर चूर हो जाने की वजह से उनकी सांस ऊपर-नीचे हो रही थी। तभी उन्होंने देखा कि एक लड़की पीठ पर बच्चे को उठाए पहाड़ पर चढ़ी आ रही है। वह लड़की उम्र में काफी छोटी थी और पहाड़ की चढ़ाई चढ़ने के बाद भी उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। वह बगैर थकान के पहाड़ पर कदम बढ़ाए चली आ रही थी। पहाड़ चढ़ते-चढ़ते जैसे ही वह लड़की महात्मा के नजदीक पहुंची, महात्माजी ने उसको रोक लिया। लड़की के प्रति दया और सहानुभूति जताते हुए उन्होंने कहा कि बेटी पीठ पर वजन ज्यादा है, धूप तेज गिर रही है, थोड़ी देर सुस्ता लो।*

*उस लड़की ने बड़ी हैरानी से महात्मा की तरफ देखा और कहा कि महात्माजी, आप यह क्या कह रहे हैं ! वजन की पोटली तो आप लेकर चल रहे हैं मैं नहीं। मेरी पीठ पर कोई वजन नहीं है। मैं जिसको उठाकर चल रही हूं, वह मेरा छोटा भाई है और इसका कोई वजन नहीं है।*

*'महात्मा के मुंह से उसी वक्त यह बात निकली - क्या अद्भुत वचन है। ऐसे सुंदर वाक्य तो मैंने वेद, पुराण, उपनिषद और दूसरे धार्मिक शास्त्रों में भी नहीं देखे हैं...!!!*

      *सच में जहां आसक्ती है,ममत्व है, वही पर बोझ है वजन है..... जहां प्रेम है वहां कोई बोझ नहीं वजन नहीं...*ओम् शांति 🌷

हैजा का इलाज किसने ढूंढा ???

क्या आपको पता है उन्नीसवीं सदी में करोड़ो को ग्रसने वाली हैजा का इलाज किसने ढूंढा ???

नहीं न !!!

आइए उस गुमनाम नायक के बारे में जानते हैं।

"सन 1817"

1817 में विश्व में एक नई बीमारी ने दस्तक दी। 




नाम था "ब्लू डेथ" 

ब्लू डेथ यानि "कॉलेरा" जिसे हिंदुस्तान में एक नया नाम दिया गया........"हैजा"।

हैजा विश्व भर में मौत का तांडव करने लगा और इसकी चपेट में आकर कर उस समय लगभग 1,80,00,000(एक करोड़ अस्सी लाख) लोगों की मौत हो गयी। दुनिया भर के वैज्ञानिक हैजा का ईलाज खोजने में जुट गये। 

"सन 1844"

रॉबर्ट कॉख नामक वैज्ञानिक ने उस जीवाणु का पता लगाया जिसकी वजह से हैजा होता है और उस जीवाणु को नाम दिया वाइब्रियो कॉलेरी। 
रॉबर्ट कॉख ने जीवाणु का पता तो लगा लिया लेकिन वह यह पता लगाने में नाकाम रहे के वाइब्रियो कॉलेरी को कैसे निष्क्रिय किया जा सकता है। 

हैज़ा फैलता रहा ........लोग मरते रहे और इस जानलेवा बीमारी को ब्लू डेथ यानि "नीली मौत" का नाम दे दिया गया। 

"1 फरवरी 1915"

पश्चिम बंगाल के एक दरिद्र परिवार में एक बालक का जन्म हुआ। नाम रखा गया "शंभूनाथ"।  शुरुआत से ही शंभूनाथ पढ़ाई में अव्वल रहे। कोलकाता मेडिकल कॉलेज में एडमिशन मिल गया। डॉक्टरी से अधिक उनका रुझान "रिसर्च" की ओर था। इसलिये 1947 में उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के कैमरोन लैब में पीएचडी में दाखिला लिया। मानव शरीर की संरचना पर शोध करते समय शंभूनाथ डे का ध्यान हैज़ा फैलाने वाले जीवाणु वाइब्रियो कॉलेरी की ओर गया। 

1949 

माटी का प्यार शंभूनाथ डे को वापिस हिंदुस्तान खींच लाया। उन्हें कलकत्ता मेडिकल कॉलेज के पैथोलॉजी विभाग का निदेशक नियुक्त किया गया और वह महामारी का रूप ले चुके हैज़े का ईलाज ढूंढने में जुट गये। 
बंगाल उस समय हैज़े के कहर से कांप उठा था। हॉस्पिटल हैजे के मरीजों से भरे हुये थे। 

1844 में रॉबर्ट कॉक के शोध के अनुसार जीवाणु व्यक्ति के सर्कुलेटरी सिस्टम यानी कि खून में जाकर उसे प्रभावित करता है। दरअसल यहीं पर रॉबर्ट कॉख ने गलती की, उन्होंने कभी सोचा ही नहीं कि यह जीवाणु व्यक्ति के किसी और अंग के ज़रिए शरीर में जहर फैला सकता है।

शंभूनाथ डे ने अपने शोध के निष्कर्ष से विश्व भर में सनसनी फैला दी। शंभूनाथ के शोध से पता चला वाइब्रियो कॉलेरी खून के रास्ते नहीं बल्कि छोटी आंत में जाकर एक टोक्सिन/जहरीला पदार्थ छोड़ता है।इसकी वजह से इंसान के शरीर में खून गाढ़ा होने लगता है और पानी की कमी होने लगती है।

1953
शंभूनाथ डे का शोध प्रकाशित के पश्चात ही ऑरल डिहाइड्रेशन सॉल्यूशन (ORS) को बनाया गया। यह सॉल्यूशन हैजे का रामबाण इलाज साबित हुआ। हिंदुस्तान और अफ्रीका में इस सॉल्यूशन के जरिये लाखों मरीजों को मौत के मुँह से निकाल लिया गया। 

विश्व भर में शंभूनाथ डे के शोध का डंका बज चुका था। परंतु उनका दुर्भाग्य था के वह शोध भारत भूमि पर हुआ था। लाखों करोड़ों लोगों को जीवनदान देने वाले शंभूनाथ को अपने ही राष्ट्र में सम्मान नहीं मिला। 

शंभूनाथ आगे इस जीवाणु पर और शोध करना चाहते थे लेकिन भारत में साधनों की कमी के चलते नहीं कर पाये। 

उनका नाम एक से अधिक बार नोबेल पुरस्कार के लिए भी दिया गया। इसके अलावा, उन्हें दुनिया भर में सम्मानों से नवाज़ा गया लेकिन भारत में वह एक गुमनाम शख्स की ज़िंदगी जीते रहे। 

शंभूनाथ की रिसर्च ने ब्लू डेथ के आगे से डेथ(मृत्यु) शब्द को हटा दिया। करोड़ों लोगों की जान बच गयी। इतनी बड़ी उपलब्धि के पश्चात भी वह "राष्ट्रीय नायक" ना बन सके। ना किसी सम्मान से नवाजे गये। ना सरकार ने सुध ली। 

यही नहीं करोड़ों लोगों की ज़िंदगी बचाने वाले इस राष्ट्रनायक के विषय में हमें पढ़ाया तक नहीं गया। 

हमें अपने असली नायकों को पहचाना होगा। उन्हें सम्मान देना होगा। 
साभार🙏

बहुत हो गया मजदूर मजदूर...

*बहुत सोचनीय विचार है !!*

ऐसा लग रहा है कि देश में सिर्फ मजदूर ही रहते हैं...
बाकी क्या भटे बघार रहे हैं?

अब मजदूरों का रोना- रोना बंद कर दीजिये !
मजदूर घर पहुंच गया तो...
उसके परिवार के पास मनरेगा का जाब कार्ड, राशन कार्ड होगा! सरकार मुफ्त में चावल व आटा दे रही है। जनधन खाते होंगे तो मुफ्त में 2000 रु. भी मिल गए होंगे, और आगे भी मिलते रहेंगे।



बहुत हो गया मजदूर मजदूर...
अब जरा उसके बारे में सोचिये...
जिसने लाखों रुपये का कर्ज लेकर प्राईवेट कालेज से इंजीनियरिंग किया था... और अभी कम्पनी में 5 से 8 हजार की नौकरी पाया था, (मजदूरो को मिलने वाली मजदूरी से भी कम), लेकिन मजबूरी वश अमीरों की तरह रहता था।
(बचत शून्य होगी) 

जिसने अभी अभी नयी नयी वकालत शुरू की थी... दो चार साल तक वैसे भी कोई केस नहीं मिलता ! दो चार साल के बाद... चार पाच हजार रुपये महीना मिलना शुरू होता है, लेकिन मजबूरी वश वो भी अपनी गरीबी का प्रदर्शन नहीं कर पाता। 
और चार छ: साल के बाद...
जब थोड़ा कमाई बढ़ती है, दस पंद्रह हजार होती हैं तो भी... लोन लेकर... कार वार खरीदने की मजबूरी आ जाती है। (बड़ा आदमी दिखने की मजबूरी जो होती है।) अब कार की किस्त भी तो भरना है ?
 
- उसके बारे में भी सोचिये...
जो सेल्स मैन, एरिया मैनेजर का तमगा लिये घूमता था। बंदे को भले ही आठ  हज़ार रुपए महीना मिले, लेकिन कभी अपनी गरीबी का प्रदर्शन नहीं किया।
 
उनके बारे में भी सोचिये जो बीमा ऐजेंट, सेल्स एजेंट बना मुस्कुराते हुए घूमते थे। आप कार की एजेंसी पहुंचे नहीं कि कार के लोन दिलाने से लेकर कार की डिलीवरी दिलाने तक के लिये मुस्कुराते हुए, साफ सुथरे कपड़े में, आपके सामने हाजिर।
बदले में कोई कुछ हजार रुपये! लेकिन अपनी गरीबी का रोना नहीं रोता है।
आत्म सम्मान के साथ रहता है।
मैंने संघर्ष करते वकील, इंजीनियर, इन्टीयर डिजाइनर, सोफा-पडदा बनाने वाले कॉन्ट्रेक्टर, और कारीगर, दर्जी काम, पत्रकार, ऐजेंट, सेल्समेन, छोटे-मंझोले दुकान वाले, क्लर्क, बाबू, स्कूली मास्टर साहब, धोबी, सलून वाले, आदि देखे हैं... अंदर भले ही चड़ढी-बनियान फटी हो, मगर अपनी गरीबी का प्रदर्शन नहीं करते हैं। 
और इनके पास 
न तो मुफ्त में चावल पाने वाला राशन कार्ड है, 
न ही जनधन का खाता,
यहाँ तक कि कईयों ने तो गैस की सब्सिडी भी छोड़ चुके हैं ! 
ऊपर से मोटर साइकिल की किस्त, या कार की किस्त ब्याज सहित देना है।

बेटी- बेटा की एक माह की फीस बिना स्कूल भेजे ही इतना देना है, जितने में दो लोगों का परिवार आराम से एक महीने खा सकता है, 
परंतु गरीबी का प्रदर्शन न करने की उसकी आदत ने उसे सरकारी स्कूल से लेकर सरकारी अस्पताल तक से दूर कर दिया है।

ऐसे ही टाईपिस्ट, स्टेनो, रिसेप्सनिस्ट, ऑफिस बॉय जैसे लोगो का वर्ग है।
अब ऐसा वर्ग क्या करे? वो तो... फेसबुक पर बैठ कर अपना दर्द भी नहीं लिख सकता है... (बड़ा आदमी दिखने की मजबूरी जो है।) 

तो मजदूर की त्रासदी का विषय मुकाम पा गया है... मजदूरो की पीढ़ा का नाम देकर ही अपनी पीढ़ा व्यक्त कर रहा है ? 

(क्या पता हैं हकीकत आपको ? IAS, PSC का सपना लेकर रात-रात भर जाग कर पढ़ने वाला छात्र तो बहुत पहले ही शहर से पैदल ही वतन को निकल लिया था... 
अपनी पहचान छिपाते हुये...
मजदूरों के वेश में? 
क्यूं वो अपनी गरीबी व मजबूरी की दुकान नहीं सजाता ! 
काश! कि देश का मध्यम वर्ग ऐसा कर पाता? वह तो दोनों वर्गों के बीच में ही कसमसाता रहता है, उसकी प्रतिभा को, उसकी हालत को समझने वाला कोई नहीं है। कोरोना से बदतर हालत में तो वह हमेशा ही रहता है... मगर उफ़ नहीं करता।
सोचनीय है !!

अब हम पूरी तरह बंटे हुए लोग हैं।

ये जो तस्वीर है वो दो भाइयों के बीच बंटवारे के बाद की बनी हुई तस्वीर है। बाप-दादा के घर की देहली को जिस तरह बांटा गया है वह हरियाणा के हर गांव-घर की असलियत को भी दर्शाता है।



दरअसल हम गांव के लोग जितने खुशहाल दिखते हैं उतने हैं नहीं। जमीनों के केस, पानी के केस, खेत-मेढ के केस, रास्ते के केस, मुआवजे के केस, व्याह शादी के झगड़े, दीवार के केस,आपसी मनमुटाव, चुनावी रंजिशों ने हरियाणवी समाज को खोखला कर दिया है।
अब गांव वो नहीं रहे कि बस में गांव की लडकी को देखते ही सीट खाली कर देते थे बच्चे। दो चार थप्पड गलती पर किसी बुजुर्ग या ताऊ ने टेक दिए तो इश्यू नहीं बनता था तब।
अब हम पूरी तरह बंटे हुए लोग हैं। गांव में अब एक दूसरे के उपलब्धियों का सम्मान करने वाले, प्यार से सिर पर हाथ रखने वाले लोग संभवत अब मिलने मुश्किल हैं।
हालात इस कदर खराब है कि अगर पडोसी फलां व्यक्ति को वोट देगा तो हम नहीं देंगे। इतनी नफरत कहां से आई है हरियाणा के लोगों में ये सोचने और चिंतन का विषय है। गांवों में कितने मर्डर होते हैं, कितने झगडे होते हैं और कितने केस अदालतों व संवैधानिक संस्थाओं में लंबित है इसकी कल्पना भी भयावह है।
संयुक्त परिवार अब गांवों में एक आध ही हैं, लस्सी-दूध जगह वहां भी डयू कोका पिलाई जाने लगी है। बंटवारा केवल भारत का नहीं हुआ था, आजादी के बाद हमारा समाज भी बंटा है और शायद अब हम भरपाई की सीमाआें से भी अब दूर आ गए हैं। अब तो वक्त ही तय करेगा कि हम और कितना बंटेंगे।

एक दिन यूं ही बातचीत में एक मित्र ने कहा कि जितना हम पढे हैं दरअसल हम उतने ही बेईमान बने हैं। गहराई से सोचें तो ये बात सही लगती है कि पढे लिखे लोग हर चीज को मुनाफे से तोलते हैं और ये बात हरियाणवी समाज को तोड रही है।
जय हिंद जय भारत
चौधरी नवदीप सिंह आर्यन 🙏🙏

FACEMASK के खतरे अभी जानलो अच्छा रहेगा

FACEMASK के खतरे *

मास्क का उपयोग सीमित समय के लिए किया जाना चाहिए। यदि आप इसे लंबे समय तक पहनते हैं:


1. रक्त में ऑक्सीजन कम हो जाती है।

2. मस्तिष्क को ऑक्सीजन कम करता है।

3. आप कमजोर महसूस करने लगते हैं।

4. मृत्यु तक ले जा सकता है।

*सलाह*


* a। * जब आप अकेले हों तो इसे बंद कर दें। मैं अपनी कार में बहुत से लोगों को अभी भी चेहरा MASK पहने हुए AC के साथ देखता हूं। अज्ञान या अशिक्षा?

* b। * इसे घर पर इस्तेमाल न करें।

* c। * केवल इसका उपयोग भीड़ वाली जगह पर करें और जब एक या अधिक व्यक्तियों के साथ निकट संपर्क में हो।

* d। * अपने आप को सबसे अधिक बार अलग करते हुए इसका उपयोग कम करें।

*सुरक्षित रहें!!!*


दवाएं जो आइसोलेशन अस्पतालों में ली जाती हैं

1. विटामिन सी -1000
2. विटामिन ई (ई)
3. (10 से 11) घंटे तक, 15-20 मिनट धूप में बैठे।
4. एक बार भोजन करें ।।
5. हम आराम करते हैं / कम से कम 7-8 घंटे सोते हैं
6. हम रोजाना 1.5 लीटर पानी पीते हैं
7. सभी भोजन गर्म (ठंडा नहीं) होना चाहिए।
और यह सब हम अस्पताल में प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए करते हैं

ध्यान दें कि कोरोनावायरस का पीएच 5.5 से 8.5 तक भिन्न होता है


इसलिए, वायरस को खत्म करने के लिए हमें बस इतना करना है कि वायरस की अम्लता के स्तर से अधिक क्षारीय खाद्य पदार्थों का सेवन करें।
जैसे कि :
हरा नींबू - 9.9 पीएच
पीला नींबू - 8.2 पीएच
एवोकैडो - 15.6 पीएच
* लहसुन - 13.2 पीएच
* आम - 8.7 पीएच
* कीनू - 8.5 पीएच
* अनानास - 12.7 पीएच
* वॉटरक्रेस - 22.7 पीएच
* संतरे - 9.2 पीएच

कैसे पता चलेगा कि आप कोरोना वायरस से संक्रमित हैं?


1. गला
2. सूखा गला
3. सूखी खांसी
4. उच्च तापमान
5. सांस की तकलीफ
6. गंध की कमी…।
और गर्म पानी के साथ नींबू फेफड़ों तक पहुंचने से पहले वायरस को खत्म कर देता है ...
इस जानकारी को खुद तक न रखें। इसे अपने सभी परिवार और दोस्तों को प्रदान करें।

मैं आपके अच्छे स्वास्थ्य और लंबी उम्र की कामना करता हूं।
🌹घर मे रहे सुरक्षित रहे🌹
🙏जय श्री महाकाल 🙏

ससुराल

ससुराल
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अक्सर कहा जाता है कि 
मायका 
माँ के साथ ही,
खत्म हो जाता है !
सच कहूं तो ,
ससुराल भी 
सास के साथ ही 
खत्म हो जाता है !


रह जाती हैं बस यादें,
उनकी उस न्यौछावर की,
जो तुमपर वार कर दी थी मिसरानी को !

उनकी उस हिदायत की,
जो तुम्हारी मुट्ठियों में चावल भरकर 
थाली में डालने की रस्म के दौरान 
कान में फुसफुसाते हुए दी थी कि
'यूंही अन्नपूर्णा बन कर रहना हमेशा !'

उनकी उस ढाल की जो,
मुंह दिखाई में तुम्हारे 
नाच न आने पर तंज कसती
औरतों के सामने 'गाना आवै इसे !'
कहकर तन गई थी!

उनकी उस  'सदा सौभाग्यवती रहो!'
वाले आशीष की 
जो तुम्हें अपने गठजोड़ संग 
उनके चरण स्पर्श करते ही मिली थी!

उनके उस अपनेपन की, 
जो तुम्हें पहली रसोई की 
रस्म निभाते कही थी 
'सब मैंने बना दिया है,
बस तुम खीर में शक्कर डाल देना !
रस्म पूरी हो जाएगी !'

उनकी उस चेतावनी की 
जो हर त्यौहार से पहले 
मिल जाया करती थी,
'अरी सुन कल सुहाग का त्यौहार है , 
मेहंदी लगा लियो !'

उनकी उस दूरदृष्टि की,
जो तुम्हारी अधूरी ख्वाहिशों के 
मलाल को सांत्वना देते दिखती कि
' सबर रक्खा करैं , देर-सबेर सब मिला करे  !'

उनके उस बहाने  की ,
जो तुम्हारे मायके 
जाने के नाम से तैयार हो जाता कि
'पता नहीं क्यों रात से जी घबड़ा रा !'

उनके उस उलाहने की,
जो तुम्हारे बच्चों संग 
सख्ती के दौरान सुनाया जाता,
'हमने तो कभी न मारे !'

उनके उस आखिरी संवाद की,
'ननद, देवरानी, जेठानी संग मिल के रहियो !'

उनके उस कुबूलनामे की, 
जो आखिरी लम्हों में 
याददाश्त खोने के बावजूद भी,
बड़बड़ाते सुना कि
'बहुत मेहनत करै , न दिन देखै न रात , 
बहुत करा इसने सबका !'

उनकी उस धमकी की जो कभी कभार 
ठिठोली करते मिलती ,
'मैं कहीं न जाऊं , 
यहीं रहूंगी इसी घर में,
तेरे सिर पे, हुकुम चलाने को !'

मैंने तो सच माने रखा 
उस ठिठोली वाली धमकी को,
तुम्हारे जाने के बाद भी !
तो क्यों नहीं याद दिलाई कल 
मेहंदी लगाने की ?
आज सुहाग का त्यौहार था,
और मैं भूल गई मेहंदी लगाना !

*मालूम नहीं,इस रिश्ते की समझ हमें देर से क्यों आती है ?

जन्म लेते ही वह बेड़ियां काटता है।

  • आपने कभी सोचा है, कि वह जेल में ही क्यों जन्मा ? हमारा काला कनुआ,,,,

भादो की काली अँधेरी रात में जब वह आया, तो सबसे पहला काम यह हुआ कि जंजीरे कट गयीं। जन्म देने वाले के शरीर की भी, और कैद करने वाली कपाटों की भी। वस्तुतः वह आया ही था जंजीरे काटने... हर तरह की जंजीर!


जन्म लेते ही वह बेड़ियां काटता है।

थोडा सा बड़ा होता है, तो लज्जा की जंजीरे काटता हैं। ऐसे काटता है कि सारा गांव चिल्लाने लगता है- कन्हैया हम तुमसे बहुत प्रेम करते हैं। सब चिल्लाते हैं- बच्चे, जवान, बूढ़े, महिलाएं, लड़कियां सब... कोई भय नहीं, कोई लज्जा नही!

वह प्रेम के बारे में सबसे बड़े भ्रम को दूर करता है, और सिद्ध करता है कि प्रेम देह का नही हृदय का विषय है। माथे पर मोरपंख बांधे आठ वर्ष की उम्र में रासलीला करते उस बालक के प्रेम में देह है क्या? मोर पंख का रहस्य जानते हैं? मोर इस जगत का एकमात्र ऐसा अद्भुत प्राणी है, जो मादा से शारीरिक सम्बन्ध नही बनाता। मेघ को देख कर नाचते मोर के मुह से गाज़ गिरती है,और वही खा कर मोरनी गर्भवती होती है। माथे पर मोर मुकुट बांधे वह बालक इस तरह स्वयं को गोस्वामी सिद्ध करता है। वह एक ही साथ "पूर्ण पुरुष" और "गोस्वामी" की दो परस्पर विरोधी उपाधियाँ धारण करता है।

कुछ दिन बाद वह समाज की सबसे बड़ी रूढ़ि पर प्रहार करता है, जब पूजा की पद्धति ही बदल देता है। अज्ञात देवताओँ के स्थान पर लौकिक और प्राकृतिक शक्तियों की पूजा को प्रारम्भ कराना उस युग की सबसे बड़ी क्रांति थी। वह नदी, पहाड़, हल, बैल, गाय, की पूजा और रक्षा की परम्परा प्रारम्भ करता है। वह इस सृष्टी का पहला पर्यावरणविद् है।

थोडा और बड़ा होता है तो परतंत्रता की बेड़ियां काटता है, और उस कालखंड के सबसे बड़े तानाशाह को मारता है। ध्यान दीजिये, राजा बन कर नही मारता, आम आदमी बन कर मारता है। कोई सेना नहीँ, कोई राजनैतिक गठजोड़ नहीं। एक आम आदमी द्वारा एक तानाशाह के नाश की एकमात्र घटना है यह।

इसके बाद वह सृष्टि की सबसे बड़ी बेड़ी पुरुषसत्ता पर प्रहार करता है। तनिक सोचिये तो, आज अपने आप को अत्याधुनिक बताने वाले लोग भी क्या इतने उदार हैं कि अपनी बहन को अपनी गाड़ी पर बैठा कर उसके प्रेमी के साथ भगा दे ? पर वह ऐसा करता है। ठीक से सोचिये तो स्त्री समानता को लागु कराने वाला पहला व्यक्ति है वह। वह स्त्री की बेड़ियां काटता है।

कुछ दिन बाद वह एक महान क्रांति करता है। नरकासुर की कैद में बंद सोलह हजार बलात्कृता कुमारियों की बेड़ी काट कर, और उनको अपना नाम दे कर समाज में रानी की गरिमा दिलाता है।

फिर वह उंच नीच की बेड़ियां काटता है और राजपुत्र हो कर भी सुदामा जैसे दरिद्र को मित्र बनाता है, और मित्रता निभाता भी है। ऐसा निभाता है कि युगों युगों तक मित्रता का आदर्श बना रहता है।

फिर अपने जीवन के सबसे बड़े रणक्षेत्र में अन्याय की बेड़ियां काटता है। कहते हैं कि यदि वह चाहता तो एक क्षण में महाभारत ख़त्म कर सकता था। पर नहीं, उसे न्याय करना है, उसे दुनिया को बताना है कि किसी स्त्री का अपमान करने वाले का समूल नाश होना ही न्याय है। वह स्वयं शस्त्र नहीं छूता, क्योकि उसे पांडवों को भी दण्डित करना है। स्त्री आपकी सम्पति नही जो आप उसको दांव पर लगा दें, स्त्री जननी है, स्त्री आधा विश्व् है। वह स्त्री को दाव पर लगाने का दंड निर्धारित करता है, और पांडवों के हाथों ही उनके पुर्वजों का वध कराता है। अर्जुन रोते हैं, और अपने दादा को मारते हैं। धर्मराज का हृदय फटता है पर उन्हें अपने मामा, नाना, भाई, भतीजा, बहनोई को मारना पड़ता है। अपने ही हाथों अपने बान्धवों की हत्या कर अपनी स्त्री को दाव पर लगाने का दंड वे जीवन भर भोगते हैं। वह न्याय करता है। वह अन्याय की बेड़ियां तोड़ता है।

वह मानव इतिहास का एकमात्र नायक है,,,, महानायक। हे ,,,,,रियल हीरो है

वह कन्हैया...भारत का प्राण कन्हैया... इस जगत का सबसे बड़ा गुरु कन्हैया... सबसे अच्छा मित्र कन्हैया... सबसे बड़ा प्रेमी कन्हैया... सबसे अच्छा पति कन्हैया... सबसे अच्छा पुत्र कन्हैया... सबसे अच्छा भाई कन्हैया... कन्हैया...
आओ कान्हा, काटो हमारी बेड़ियां! 
काटो मोह के बंधन ,,
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