विचारणीय - Updated

बहुत हो गया मजदूर मजदूर...

*बहुत सोचनीय विचार है !!*

ऐसा लग रहा है कि देश में सिर्फ मजदूर ही रहते हैं...
बाकी क्या भटे बघार रहे हैं?

अब मजदूरों का रोना- रोना बंद कर दीजिये !
मजदूर घर पहुंच गया तो...
उसके परिवार के पास मनरेगा का जाब कार्ड, राशन कार्ड होगा! सरकार मुफ्त में चावल व आटा दे रही है। जनधन खाते होंगे तो मुफ्त में 2000 रु. भी मिल गए होंगे, और आगे भी मिलते रहेंगे।



बहुत हो गया मजदूर मजदूर...
अब जरा उसके बारे में सोचिये...
जिसने लाखों रुपये का कर्ज लेकर प्राईवेट कालेज से इंजीनियरिंग किया था... और अभी कम्पनी में 5 से 8 हजार की नौकरी पाया था, (मजदूरो को मिलने वाली मजदूरी से भी कम), लेकिन मजबूरी वश अमीरों की तरह रहता था।
(बचत शून्य होगी) 

जिसने अभी अभी नयी नयी वकालत शुरू की थी... दो चार साल तक वैसे भी कोई केस नहीं मिलता ! दो चार साल के बाद... चार पाच हजार रुपये महीना मिलना शुरू होता है, लेकिन मजबूरी वश वो भी अपनी गरीबी का प्रदर्शन नहीं कर पाता। 
और चार छ: साल के बाद...
जब थोड़ा कमाई बढ़ती है, दस पंद्रह हजार होती हैं तो भी... लोन लेकर... कार वार खरीदने की मजबूरी आ जाती है। (बड़ा आदमी दिखने की मजबूरी जो होती है।) अब कार की किस्त भी तो भरना है ?
 
- उसके बारे में भी सोचिये...
जो सेल्स मैन, एरिया मैनेजर का तमगा लिये घूमता था। बंदे को भले ही आठ  हज़ार रुपए महीना मिले, लेकिन कभी अपनी गरीबी का प्रदर्शन नहीं किया।
 
उनके बारे में भी सोचिये जो बीमा ऐजेंट, सेल्स एजेंट बना मुस्कुराते हुए घूमते थे। आप कार की एजेंसी पहुंचे नहीं कि कार के लोन दिलाने से लेकर कार की डिलीवरी दिलाने तक के लिये मुस्कुराते हुए, साफ सुथरे कपड़े में, आपके सामने हाजिर।
बदले में कोई कुछ हजार रुपये! लेकिन अपनी गरीबी का रोना नहीं रोता है।
आत्म सम्मान के साथ रहता है।
मैंने संघर्ष करते वकील, इंजीनियर, इन्टीयर डिजाइनर, सोफा-पडदा बनाने वाले कॉन्ट्रेक्टर, और कारीगर, दर्जी काम, पत्रकार, ऐजेंट, सेल्समेन, छोटे-मंझोले दुकान वाले, क्लर्क, बाबू, स्कूली मास्टर साहब, धोबी, सलून वाले, आदि देखे हैं... अंदर भले ही चड़ढी-बनियान फटी हो, मगर अपनी गरीबी का प्रदर्शन नहीं करते हैं। 
और इनके पास 
न तो मुफ्त में चावल पाने वाला राशन कार्ड है, 
न ही जनधन का खाता,
यहाँ तक कि कईयों ने तो गैस की सब्सिडी भी छोड़ चुके हैं ! 
ऊपर से मोटर साइकिल की किस्त, या कार की किस्त ब्याज सहित देना है।

बेटी- बेटा की एक माह की फीस बिना स्कूल भेजे ही इतना देना है, जितने में दो लोगों का परिवार आराम से एक महीने खा सकता है, 
परंतु गरीबी का प्रदर्शन न करने की उसकी आदत ने उसे सरकारी स्कूल से लेकर सरकारी अस्पताल तक से दूर कर दिया है।

ऐसे ही टाईपिस्ट, स्टेनो, रिसेप्सनिस्ट, ऑफिस बॉय जैसे लोगो का वर्ग है।
अब ऐसा वर्ग क्या करे? वो तो... फेसबुक पर बैठ कर अपना दर्द भी नहीं लिख सकता है... (बड़ा आदमी दिखने की मजबूरी जो है।) 

तो मजदूर की त्रासदी का विषय मुकाम पा गया है... मजदूरो की पीढ़ा का नाम देकर ही अपनी पीढ़ा व्यक्त कर रहा है ? 

(क्या पता हैं हकीकत आपको ? IAS, PSC का सपना लेकर रात-रात भर जाग कर पढ़ने वाला छात्र तो बहुत पहले ही शहर से पैदल ही वतन को निकल लिया था... 
अपनी पहचान छिपाते हुये...
मजदूरों के वेश में? 
क्यूं वो अपनी गरीबी व मजबूरी की दुकान नहीं सजाता ! 
काश! कि देश का मध्यम वर्ग ऐसा कर पाता? वह तो दोनों वर्गों के बीच में ही कसमसाता रहता है, उसकी प्रतिभा को, उसकी हालत को समझने वाला कोई नहीं है। कोरोना से बदतर हालत में तो वह हमेशा ही रहता है... मगर उफ़ नहीं करता।
सोचनीय है !!

अब हम पूरी तरह बंटे हुए लोग हैं।

ये जो तस्वीर है वो दो भाइयों के बीच बंटवारे के बाद की बनी हुई तस्वीर है। बाप-दादा के घर की देहली को जिस तरह बांटा गया है वह हरियाणा के हर गांव-घर की असलियत को भी दर्शाता है।



दरअसल हम गांव के लोग जितने खुशहाल दिखते हैं उतने हैं नहीं। जमीनों के केस, पानी के केस, खेत-मेढ के केस, रास्ते के केस, मुआवजे के केस, व्याह शादी के झगड़े, दीवार के केस,आपसी मनमुटाव, चुनावी रंजिशों ने हरियाणवी समाज को खोखला कर दिया है।
अब गांव वो नहीं रहे कि बस में गांव की लडकी को देखते ही सीट खाली कर देते थे बच्चे। दो चार थप्पड गलती पर किसी बुजुर्ग या ताऊ ने टेक दिए तो इश्यू नहीं बनता था तब।
अब हम पूरी तरह बंटे हुए लोग हैं। गांव में अब एक दूसरे के उपलब्धियों का सम्मान करने वाले, प्यार से सिर पर हाथ रखने वाले लोग संभवत अब मिलने मुश्किल हैं।
हालात इस कदर खराब है कि अगर पडोसी फलां व्यक्ति को वोट देगा तो हम नहीं देंगे। इतनी नफरत कहां से आई है हरियाणा के लोगों में ये सोचने और चिंतन का विषय है। गांवों में कितने मर्डर होते हैं, कितने झगडे होते हैं और कितने केस अदालतों व संवैधानिक संस्थाओं में लंबित है इसकी कल्पना भी भयावह है।
संयुक्त परिवार अब गांवों में एक आध ही हैं, लस्सी-दूध जगह वहां भी डयू कोका पिलाई जाने लगी है। बंटवारा केवल भारत का नहीं हुआ था, आजादी के बाद हमारा समाज भी बंटा है और शायद अब हम भरपाई की सीमाआें से भी अब दूर आ गए हैं। अब तो वक्त ही तय करेगा कि हम और कितना बंटेंगे।

एक दिन यूं ही बातचीत में एक मित्र ने कहा कि जितना हम पढे हैं दरअसल हम उतने ही बेईमान बने हैं। गहराई से सोचें तो ये बात सही लगती है कि पढे लिखे लोग हर चीज को मुनाफे से तोलते हैं और ये बात हरियाणवी समाज को तोड रही है।
जय हिंद जय भारत
चौधरी नवदीप सिंह आर्यन 🙏🙏

ससुराल

ससुराल
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अक्सर कहा जाता है कि 
मायका 
माँ के साथ ही,
खत्म हो जाता है !
सच कहूं तो ,
ससुराल भी 
सास के साथ ही 
खत्म हो जाता है !


रह जाती हैं बस यादें,
उनकी उस न्यौछावर की,
जो तुमपर वार कर दी थी मिसरानी को !

उनकी उस हिदायत की,
जो तुम्हारी मुट्ठियों में चावल भरकर 
थाली में डालने की रस्म के दौरान 
कान में फुसफुसाते हुए दी थी कि
'यूंही अन्नपूर्णा बन कर रहना हमेशा !'

उनकी उस ढाल की जो,
मुंह दिखाई में तुम्हारे 
नाच न आने पर तंज कसती
औरतों के सामने 'गाना आवै इसे !'
कहकर तन गई थी!

उनकी उस  'सदा सौभाग्यवती रहो!'
वाले आशीष की 
जो तुम्हें अपने गठजोड़ संग 
उनके चरण स्पर्श करते ही मिली थी!

उनके उस अपनेपन की, 
जो तुम्हें पहली रसोई की 
रस्म निभाते कही थी 
'सब मैंने बना दिया है,
बस तुम खीर में शक्कर डाल देना !
रस्म पूरी हो जाएगी !'

उनकी उस चेतावनी की 
जो हर त्यौहार से पहले 
मिल जाया करती थी,
'अरी सुन कल सुहाग का त्यौहार है , 
मेहंदी लगा लियो !'

उनकी उस दूरदृष्टि की,
जो तुम्हारी अधूरी ख्वाहिशों के 
मलाल को सांत्वना देते दिखती कि
' सबर रक्खा करैं , देर-सबेर सब मिला करे  !'

उनके उस बहाने  की ,
जो तुम्हारे मायके 
जाने के नाम से तैयार हो जाता कि
'पता नहीं क्यों रात से जी घबड़ा रा !'

उनके उस उलाहने की,
जो तुम्हारे बच्चों संग 
सख्ती के दौरान सुनाया जाता,
'हमने तो कभी न मारे !'

उनके उस आखिरी संवाद की,
'ननद, देवरानी, जेठानी संग मिल के रहियो !'

उनके उस कुबूलनामे की, 
जो आखिरी लम्हों में 
याददाश्त खोने के बावजूद भी,
बड़बड़ाते सुना कि
'बहुत मेहनत करै , न दिन देखै न रात , 
बहुत करा इसने सबका !'

उनकी उस धमकी की जो कभी कभार 
ठिठोली करते मिलती ,
'मैं कहीं न जाऊं , 
यहीं रहूंगी इसी घर में,
तेरे सिर पे, हुकुम चलाने को !'

मैंने तो सच माने रखा 
उस ठिठोली वाली धमकी को,
तुम्हारे जाने के बाद भी !
तो क्यों नहीं याद दिलाई कल 
मेहंदी लगाने की ?
आज सुहाग का त्यौहार था,
और मैं भूल गई मेहंदी लगाना !

*मालूम नहीं,इस रिश्ते की समझ हमें देर से क्यों आती है ?

कौन है जो आज परेशान नहीं है! || लॉकडाउन

मेरे घर के सामने से इंडो नेपाल बॉर्डर तक जाने वाली NH28 निकलती है।
सावन के महीने में, कावड़ के त्यौहार में इस सड़क पर लाखों की भीड़ नंगे पांव उतरती है।
यह एक धार्मिक/सामाजिक उत्सव होता है जिसमें यही समाज, जिसे आज निष्ठुर कहा जा रहा है वही महाजन, सेठ, आम बाशिंदे उन नंगे पैर पैदल चलने वाले लोगों की सुविधा का खयाल रखने का प्रयास करते हैं।
जो आर्थिक रूप से सक्षम होते हैं वो सड़क पर दरियां बिछवा देते हैं, भंडारे चलाते हैं, शर्बत पिलवाते हैं, आराम करने के लिए गद्दे और पावों की चोट और दर्द के लिए दवा देते हैं।
जो आर्थिक रूप से असमर्थ होते है वो पैदल चलते, दौड़ते लोगों के पावों पर गुनगुना पानी फेंकते रहते हैं ताकि थकान उतर सके।


ऐसा करने वाले किसी एक नगर के वासी नहीं होते।
उस हाईवे के किनारे बसे लगभग हर ब्लॉक पर, हर दो तीन किलोमीटर पर, ऐसी व्यवस्था के साथ स्वतः तैनात लोग दिख जाएंगे।
यह इकलौता उदाहरण नहीं है।
लखनऊ में बड़े मंगल के भंडारे में, मुम्बई में गणपति पूजा में, बिहार में छठ में...हर जगह समाज का हिस्सा, दूसरे हिस्से को निःशुल्क, निःस्वार्थ सुविधा देने का प्रयास करता है।
इन्हें किसी सरकारी आदेश का इंतजार नहीं होता।
आज उसी शहरी, कस्बाई समाज का हिस्सा सड़कों पर पैदल जाने वाले मजदूरों की वैसी ही युद्धस्तर पर मदद करता नहीं दिख पा रहा तो इसकी सबसे बड़ी वजह कोरोना का संक्रामक होना है।
फिर भी लोग जितना बन पड़ रहा है...कर रहे हैं।
सड़क पर सिर्फ मजदूर नहीं, वो भी हैं जो राह आसान करने की कोशिश कर रहे।
इसमें सरकार और समाज दोनों शामिल हैं।
फिर भी ऐसा घनघोर क्रिटिसिज्म !
क्या हमें गरीबी को एक खास तरह से रोमैंटीसाइज़ करते रहना चाहिए!
क्या भोले और सयाने, निश्छल और कुटिल का शाश्वत, सटीक पैमाना क्रमश: गरीबी और अमीरी को मानना चाहिये!
शायद, हाँ।
कम से कम सैंकड़ो हिंदी फिल्में तो यही बताती है।
वरना कोई तो होता जो नज़र उठाकर खोजता कि जरा देखूं तो सही, जग में आज कौन परेशान नहीं है!
सब हैं...कोई नहीं बचा है।
एक बहुत छोटा सा उदाहरण है,
जब तक किसी के जीवन मरण का सवाल ना बन जाये तो आज कितने लोग हॉस्पिटल का मुंह देखना पसंद करेंगे!
जाने कितने ऐसे लोग है जिन्हें शुगर, बीपी जैसी रेगुलर चेकअप मांगती गंभीर बीमारियां हैं लेकिन वो दो महीने से मनमसोस कर, रामभरोसे घर में बैठे हैं।
क्योंकि, बाहर निकलने में, खासकर अस्पताल जाने में कोरोना का खतरा है।
ये क्या एक ही सेक्शन है समाज का!
पता नहीं कितने हैं जिन्होंने लॉकडाउन के दो चार महीने पहले ही अपना स्टार्टअप शुरू किया था और अब उन्हें पता नहीं है कि अपना ब्रेक इवन पॉइंट वो कभी देख भी पाएंगे या नहीं।
मेरे अपने बहुतेरे जानने वाले हैं जिनके बिज़नेस को ठीक ठाक झटका लग भी चुका है।
एक क्लाइंट रूरल टूरिज्म में हाथ आजमा रहे थे, आज दोनों हाथों से सिर पकड़े हैं।
एक मित्र ने कुछ महीने पहले ही अपनी कोचिंग की नई ब्रांच डाली थी। जगह के मालिक को तगड़ा एडवांस दिया था।आज कोचिंग बंद हैं। ऑनलाइन क्लासेज के लिए पेरेंट्स का रिस्पांस चलताऊ है और फीस देने के नाम पर टालमटोल है, जबकि उसे किराया और टीचर को सैलरी देते रहना है।
एक क्लाइंट ने लाखों का लोन लेकर 78 महीने पहले मिठाई शॉप खोली थी। लॉकडाउन ने लाखों का तैयार माल फंसा दिया।
एक मित्र का टैक्सी बिज़नेस लॉकडाउन के बाद से बंद है...दिल्ली में है। गाड़ियों की किश्त अलबत्ता ज़रूर तनाव दे रही है।
एक क्लाइंट ने इसी जनवरी में साड़ियों के भव्य शोरूम का, इलाके का भव्यतम उद्घाटन किया। कल बता रहे थे कि मार्किट में कपड़ों के नाम पर सिर्फ मास्क, गमछा और अंडरगारमेंट्स बिक पा रहे।
एक कॉर्पोरेट जगत के मित्र को उसके सीनियर मैनेजमेंट का स्पष्ट इशारा है, सेकंड सोर्स ऑफ इनकम का इंतज़ाम देख लो। ठीक ठाक सैलरी कट तो हर हाल में पक्का है।
इलाके के कितने लड़के थे जो प्रमाणपत्र और प्रिंटआउट की दुकान या ऐसे उपक्रम से पेट पाल रहे थे, दो महीने से घर पर हैं।
जो घर में बैठे हैं वो भी हाइपरटेंशन, एंजाइटी, पैनिक अटैक का शिकार हो रहे।
कौन है जो आज परेशान नहीं है!
किसने अपनी सेविंग्स नहीं खंगाली।
किसके गले में रोटी पुराना वाला स्वाद दे रही!
आज यहां सबका अपना रणक्षेत्र है, अपना युद्ध है, अपनी अपनी आहुति है।

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संस्कार
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एक घर मे तीन भाई और एक बहन थी...बड़ा और छोटा पढ़ने मे बहुत तेज थे। उनके मा बाप उन चारो से बेहद प्यार करते थे मगर मझले बेटे से थोड़ा परेशान से थे।
बड़ा बेटा पढ़ लिखकर डाक्टर बन गया।

छोटा भी पढ लिखकर इंजीनियर बन गया। मगर मझला बिलकुल अवारा और गंवार बनके ही रह गया। सबकी शादी हो गई । बहन और मझले को छोड़ दोनों भाईयो ने Love मैरीज की थी।
बहन की शादी भी अच्छे घराने मे हुई थी।
आखीर भाई सब डाक्टर इंजीनियर जो थे।

अब मझले को कोई लड़की नहीं मिल रही थी। बाप भी परेशान मां भी।
बहन जब भी मायके आती सबसे पहले छोटे भाई और बड़े भैया से मिलती। मगर मझले से कम ही मिलती थी। क्योंकि वह न तो कुछ दे सकता था और न ही वह जल्दी घर पे मिलता था।
वैसे वह दिहाडी मजदूरी करता था। पढ़ नहीं सका तो...नौकरी कौन देता। मझले की शादी कीये बिना बाप गुजर गये ।

माँ ने सोचा कहीं अब बँटवारे की बात न निकले इसलिए अपने ही गाँव से एक सीधी साधी लड़की से मझले की शादी करवा दी।
शादी होते ही न जाने क्या हुआ की मझला बड़े लगन से काम करने लगा ।
दोस्तों ने कहा... ए चन्दू आज अड्डे पे आना।
चंदू - आज नहीं फिर कभी
दोस्त - अरे तू शादी के बाद तो जैसे बिबी का गुलाम ही हो गया?
चंदू - अरे ऐसी बात नहीं । कल मैं अकेला एक पेट था तो अपने रोटी के हिस्से कमा लेता था। अब दो पेट है आज
कल और होगा।

घरवाले नालायक कहते थे कहते हैं मेरे लिए चलता है।
मगर मेरी पत्नी मुझे कभी नालायक कहे तो मेरी मर्दानगी पर एक भद्दा गाली है। क्योंकि एक पत्नी के लिए उसका पति उसका घमंड इज्जत और उम्मीद होता है। उसके घरवालो ने भी तो मुझपर भरोसा करके ही तो अपनी बेटी दी होगी...फिर उनका भरोसा कैसे तोड़ सकता हूँ । कालेज मे नौकरी की डिग्री मिलती है और ऐसे संस्कार मा बाप से मिलते हैं ।

इधर घरपे बड़ा और छोटा भाई और उनकी पत्नीया मिलकर आपस मे फैसला करते हैं की...जायदाद का बंटवारा हो जाये क्योंकि हम दोनों लाखों कमाते है मगर मझला ना के बराबर कमाता है। ऐसा नहीं होगा।
मां के लाख मना करने पर भी...बंटवारा की तारीख तय होती है। बहन भी आ जाती है मगर चंदू है की काम पे निकलने के बाहर आता है। उसके दोनों भाई उसको पकड़कर भीतर लाकर बोलते हैं की आज तो रूक जा? बंटवारा कर ही लेते हैं । वकील कहता है ऐसा नहीं होता। साईन करना पड़ता है।
चंदू - तुम लोग बंटवारा करो मेरे हिस्से मे जो देना है दे देना। मैं शाम को आकर अपना बड़ा सा अगूंठा चिपका दूंगा पेपर पर।

बहन- अरे बेवकूफ ...तू गंवार का गंवार ही रहेगा। तेरी किस्मत अच्छी है की तू इतनी अच्छे भाई और भैया मिलें
मां- अरे चंदू आज रूक जा।
बंटवारे में कुल दस विघा जमीन मे दोनों भाई 5- 5 रख लेते हैं ।
और चंदू को पुस्तैनी घर छोड़ देते है
तभी चंदू जोर से चिल्लाता है।
अरे???? फिर हमारी छुटकी का हिस्सा कौन सा है?
दोनों भाई हंसकर बोलते हैं
अरे मूरख...बंटवारा भाईयो मे होता है और बहनों के हिस्से मे सिर्फ उसका मायका ही है।
चंदू - ओह... शायद पढ़ा लिखा न होना भी मूर्खता ही है।
ठीक है आप दोनों ऐसा करो।
मेरे हिस्से की वसीएत मेरी बहन छुटकी के नाम कर दो।
दोनों भाई चकीत होकर बोलते हैं ।
और तू?
चंदू मां की और देखके मुस्कुराके बोलता है
मेरे हिस्से में माँ है न......

फिर अपनी बिबी की ओर देखकर बोलता है..मुस्कुराके...क्यों चंदूनी जी...क्या मैंने गलत कहा?
चंदूनी अपनी सास से लिपटकर कहती है। इससे बड़ी वसीएत क्या होगी मेरे लिए की मुझे मां जैसी सासु मिली और बाप जैसा ख्याल रखना वाला पति।
बस येही शब्द थे जो बँटवारे को सन्नाटा मे बदल दिया ।

बहन दौड़कर अपने गंवार भैया से गले लगकर रोते हुए कहती है की..मांफ कर दो भैया मुझे क्योंकि मैं समझ न सकी आपको।
चंदू - इस घर मे तेरा भी उतना ही अधिकार है जीतना हम सभी का।

बहुओं को जलाने की हिम्मत कीसी मे नहीं मगर फिर भी जलाई जाती है क्योंकि शादी के बाद हर भाई हर बाप उसे पराया समझने लगते हैं । मगर मेरे लिए तुम सब बहुत अजीज हो चाहे पास रहो या दुर।
माँ का चुनाव इसलिए कीया ताकी तुम सब हमेशा मुझे याद आओ। क्योंकि ये वही कोख है जंहा हमने साथ साथ 9 - 9 महीने गुजारे। मां के साथ तुम्हारी यादों को भी मैं रख रहा हूँ।

दोनों भाई दौड़कर मझले से गले मिलकर रोते रोते कहते हैं
आज तो तू सचमुच का बाबा लग रहा है। सबकी पलको पे पानी ही पानी। सब एक साथ फिर से रहने लगते है।

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