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भगवान् के आने में देर नहीं || आध्यात्मिक कहानियां

 "भगवान् के आने में देर नहीं"
श्रद्धा और विश्वासपूर्वक भगवान् को पुकारें तथा इतना आर्तभाव रहे जो भगवान् को द्रवित कर दे। और, उनकी कृपालुता पर परम विश्वास रहे। प्रार्थना करने मात्रकी देर है फिर उनके आने में देर नहीं है।
 भगवान् के आने में देर नहीं  || आध्यात्मिक कहानियां
एक दिन की बात है कि महामुनि दुर्वासा दुर्योधन के यहाँ गये। सत्कार-स्वागत हुआ। दुर्योधन ने मन में समझा कि ये हैं बड़े क्रोधी पर बड़े सीधे हैं, सरल हैं, बहुत भोले हैं और जो मुँह से कह दें वह करना पड़ता है ब्रह्मा को भी। यह इनकी ताकत है तो ऐसा उपाय करें कि पाण्डव इनके शाप के भागी बन जायें।
जिसका हृदय दुष्ट होता है उसके हृदय में इसी प्रकार की योजनाएँ आती हैं। दुष्ट व्यक्ति योजना बनाता है पर बनाता है अनिष्ट की अपनी भी और जगत् की भी। उसके द्वारा सुयोजना नहीं होती। दुर्योधन ने सोचा कि ये आ ही गये हैं और ऐसा कोई प्रयत्न करें कि इनके द्वारा अभिशप्त होकर-शाप पाकर पाण्डव मारे जायें तो न अपने को लड़ना पड़े और अपना निष्कण्टक राज्य भी हो जाय। आज ये आ गये हैं, काम बन गया।

 दुर्वासाजी भोजन करके जब आसनपर बैठे तब दुर्योधन ने हाथ-पैर दबाये, वे प्रसन्न हो गये। दुर्योधन ने कहा, महाराजजी ! एक हमारी प्रार्थना भी है। बोले-क्या ? उसने कहा-हमारे पाँच भाई और हैं। वे वन में रहते हैं और बड़े धर्मात्मा हैं। महाराज ! इतने बड़े धार्मिक हैं कि जगत में कोई है नहीं। 

आप एक बार जाकर उनकी कुटिया को भी पवित्र करें। बोले-हाँ, जायँगे। कहा-एक प्रार्थना और है महाराज ! सबेरे जायँगे तो उनके अग्निहोत्र में तथा उनके अन्य कामों में बाधा पड़ेगी। आप शाम को जाइयेगा। उन्होंने कहा-ठीक है शाम को ही जायँगे। सरल हृदय के दुर्वासाजी ने कह दिया जायँगे। उनके साथ चलता-फिरता विश्वविद्यालय था। 

पहले हमारे यहाँ गुरुकुल होते थे। चल गुरुकुल तथा अचल गुरुकुल। गुरुजी के साथ विशाल शिष्यसमूह चलता था। इसलिये वह चल गुरुकुल कहलाता था। अचल गुरुकुल भी थे जैसे सान्दीपनि-आश्रम। दुर्वासाजी के साथ थे दस हजार विद्यार्थी।
दुर्वासाजी शिष्यों के साथ युधिष्ठिर महाराज के पास अपराह्नकाल में पहुँचे। 

महाराज ! आइये, स्वागत है। पैर धोये, अर्घ्य दिया और आचमन कराया। महाराज, भोजन ? दुर्वासाजी बोले-अच्छा, हम नदीतट से संध्या करके आते हैं, शाम हो गयी है। तब आकर जीमेंगे। वे तो चले गये। इन्होंने पीछे से द्रौपदी को बुलाया। बोले-द्रौपदी ! क्या होगा ? द्रौपदी बोली–महाराज ! मैं तो भोजन कर चुकी। 

उसे सूर्य भगवान् का वरदान था कि जब तक पात्र का भोजन द्रौपदी नहीं खायेगी तब तक उसमें से भले लाखों आदमी आकर खा लें पात्र रहेगा अक्षय, किंतु जब द्रौपदी खा लेगी तो उस दिन पात्र में से और भोजन-सामग्री नहीं मिलेगी। द्रौपदी क्या करती कि सभी को भोजन कराने के बाद अतिथियों की, अभ्यागतों की तब तक बाट देखा करती, अपराह्न काल में बाहर खड़ी पुकारती कि कोई भूखा हो, किसी को अन्न चाहिये, वह आ जाय। जब दूर-दूरके लोग आ जाते, भोजन कर लेते, तब द्रौपदी भोजन करती। रोज वहाँ भण्डारा होता, एक दिन नहीं। दूर-दूरके लोग आते कि भई, वहाँ मिलेगा ही और मिलता ही था। किंतु आज तो द्रौपदी भोजन कर चुकी थी। बोली-महाराज! मैं तो भोजन कर चुकी। 

अब कोई सामान तो वहाँ है नहीं। धर्मराज ने कहा, अब क्या होगा ? द्रौपदी बोली-अब क्या होगा, डरते क्यों हैं आप ? मेरे श्रीकृष्ण कहाँ गये हैं। धर्मराज बोले-वह तो गये न द्वारका ! बोली-द्वारका नहीं गये। याद किया श्रीकृष्ण! बचाओ। बस, तैयार। मानो खड़े थे वहीं पर और आकर बोले-कृष्णा ! मुझे बड़ी भूख लगी है, कुछ खाने को हो तो दो। द्रौपदी बोली, भगवन् ! खाने को तो नहीं है। इसीलिये आपका स्मरण किया है। 

आज भोजन को लेकर ही बड़ा संकट आ गया है। भगवान् बोले कि देखो भई, विनोद का अवसर होता है, मैं तो भूखा खड़ा हूँ और तुम मुझसे विनोद करती हो। वह बोली-महाराज ! विनोद नहीं, सचमुच खाने को नहीं है। वे बोले-ला, अपनी बटलोई तो ला। द्रौपदी बटलोई ले आयी। भगवान् ने देखा एक पत्ता साग का, तुलसी का या किसी चीज का उसमें लगा था। भगवान् ने पत्ता उठाया और कहा- तू कहती है कि नहीं है। 

यह तो सारे विश्व को तृप्त करने के लिये पर्याप्त है; क्योंकि इससे तृप्त होंगे विश्वात्मा। सारे विश्व के आत्मा तृप्त हो जायें-विश्वात्मा, फिर क्या।
भगवान् ने उस साग का एक पत्ता खाया और खाकर कह दिया कि सारा विश्व तृप्त हो जाय। कहने भर की देर थी कि सारा विश्व संतृप्त हो गया। उधर दस हजार विद्यार्थियों सहित दुर्वासा मुनि नदी में सूर्योपस्थान कर रहे थे और उन्हें डकार आने लगी। सभी के पेट फूल गये और सब आपस में एक-दूसरे को देखने लगे। दुर्वासाजी ने कहा-अब यहाँ से भागो।
भगवान् के कहने पर जब भीमसेन और सहदेव दुर्वासाजी को बुलाने नदीतट पर गये तब उन्हें भीलों ने बताया कि महाराज ! वे तो एक दूसरे रास्ते से भाग गये। यह है सकाम भक्ति में भगवान् पर एकान्त विश्वास। सकाम भक्ति हो और निष्ठा यदि अनन्य हो तो वह अनन्य निष्ठा सकामता को नष्ट कर देती है और प्रेम दे देती है।
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"जय जय श्री राधे कृष्णा"
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